दान का महत्व

शास्त्रों में दान की महिमा बहुत गाई गयी है शास्त्रों में दान के महत्व को दर्शाते हुए यह बार-बार कहा है कि हर व्यक्ति को किसी प्रकार से दान देना चाहिए चाहे वह कैसी भी स्थिति और परिस्थिति से गुजर रहा है I यह समाज की आवश्यकता है क्योंकि समाज में हर व्यक्ति इतना सक्षम नहीं है कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं कर सके तो इस कमी को पूरा करने के लिए समृद्ध लोगों की तरफ से जरूरतमंदों को जो वस्तु की पूर्ति की जाती है दान कहलाता है वर्तमान समय में यह भी देखा गया है कि दान के नाम पर है चोरी चकारी भी की जाती है जैसे किसी धार्मिक संस्था को दान देकर अपने दो नंबर के धंधे को एक नंबर में बदलना तो यह दान नहीं होता यह दान का उपहास है किसी तरह से दान का रूप देकर अपने गोरखधंधे को चलाने की पूरी की पूरी प्रक्रिया होती है यह किसी भी तरह से दान नहीं कहा जा सकता है

#वेद (बृहनदारनकोउपनिषद)

शास्त्रों में उल्लेख आता है कि एक बार ब्रह्मा जी के पास उनके सभी पुत्र अर्थात देवता मनुष्य और राक्षस उनके पास गए और परम पिता ब्रह्मा जी से निवेदन किया कि ब्रह्मा जी आप हमें उपदेश करें उनकी बातों को सुनकर ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों को कहा द द द तीन बार शब्द का उल्लेख किया और कहा की क्या तुम तीन ये बाते समझ गए तो वे बोले हां समझ गए तो उनसे पूछा गया की क्या समझे I इन तीनों शब्दों के माध्यम से कर्तव्यों का बोध कराया गया है

#देवता

देवताओं की यह कहा गया की तुम लोग दिन रात विषय भोगों में ही लिप्त रहते हैं और अपनी कर्तव्यों का निर्वाह भली-भांति नहीं करते हो तुमको अपनी इंद्रियों का दमन करना चाहिए तो ब्रह्मा जी ने देवताओं को दमन करने का यह आदेश दिया कि वे अपनी इंद्रियों पर संयम रखते हुए उनका दमन करें यह संदेश देवताओं के लिए दिया गया था

#मनुष्य

मनुष्य तुम लोग लोग संसार में आए हो अपने कर्तव्यों और कर्मों को करने के लिए तो तुम्हार यह कर्तव्य बनता है कि तुम अपने द्वारा की गई कमाई का एक हिस्सा दान में संसार की भलाई में लगाओ यह भलाई आप संसार में गरीब मनुष्यों की सहायता करके जरूरतमंदों की सहायता करके पशु पक्षियों की सहायता करके और इसी प्रकार संसार की भलाई में आपको अपनी कमाई का एक हिस्सा दान करना है तो ब्रह्माजी ने मनुष्यों को आदेश दिया कि वह संसार में दान को महत्व दें

#राक्षस

राक्षस तुम लोग संसार में बहुत ही हिंसात्मक होते हो और लोगों को बेवजह तंग करते हो खून खराबा करते हो लोगों को बिना ही कारण के प्रताड़ित करते हो इसलिए तुम लोग को राक्षस बोलते हैं तुम्हारे अंदर मनुष्य वाला और देव वाला कोई भी गुण नहीं होता है तो तुम लोगों को संसार में रहते हुए दया का भाव अपने अंदर लगाना चाहिए तो परमपिता ब्रह्मा जी ने राक्षसों का आदेश दिया अपने जीवन में दया को स्थान दे I

यही पर यह भी कहा गया की जब मेघ गर्जना होती है तो उसमे द द द की आवाज होती है तो ये मेघ गर्जना यही सन्देश देती है की आप तीनों जन आपने कर्तव्यों को निर्वाह करो और विशेष रूप से मनुष्यों दान करो

#रामचरितमानस

तुलसी दस जी ने रामचरितमानस में दान को बहुत ही महत्व दिया है

प्रगट चारि पद धर्म के कलि महुँ एक प्रधान। जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान॥103 ख॥

#भाव – धर्म के चार चरण होते है जैसे सत्य, दया, तप और दान, जिसमे से कलयुग में दान ही प्रधान है जिस भी प्रकार से दीजिये दान कराई कल्याण, दान देना महा कल्याणकारी होता है कल्याण करने वाला होता है दान देने से शारीरिक और मानसिक विकास होता है इसलिए दान दिया जाना चाहिए

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी।

तुलसीदास जी ने एक अन्य दोहे में दान के महत्व को बताते हुए यह बताया है कि दान के तीन प्रयोग होते हैं उन तीनों प्रयोगों (दान, भोग और संचय ) में से जो पहला होता है वहीं कल्याणकारी है वही धन्य है

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे॥

रामचंद्र जी दान दिया करते थे कई अश्वमेध यग्य किये और ब्राह्मणों को दान दिए

#श्री_भगवत_गीता (17 अध्याय)

श्री कृष्ण भगवान ने गीता के अंदर दान के महत्व को उजागर करते हुए उसको तीनों गुणों के आधार पर विभाजित किया है क्योंकि तीन प्रकार की मनुष्य की प्रवृतियां हुआ करती हैं जिन्हें गुण कहा जाता है सात्विक राजसिक तामसिक भी कह सकते हैं ।

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥

ऐसा दान जो हमारा दान देना कर्तव्य है इस कर्तव्य को समझते हुए दिया जाता है और जिसके प्रति दान दिया जाता है उससे उसके बदले में कुछ भी पाने की आशा ना हो और देश काल पात्र को देखते हुए जो दान दिया जाता है वह सात्विक दान है अर्थात मुझे दान देना है यह मेरा कर्तव्य है क्योंकि धर्म की के अनुरूप है और देश काल और पात्र को देना है इसका मतलब स्थान से है कहीं पर भोजन की व्यवस्था उपलब्ध है वहां पर भंडारा करना इस में नहीं आता है जैसे किसी मार्केट में आजकल आप देखते हैं कि सारे खाने की सुविधाएं उपलब्ध होती है लोग भंडारा करने लगते है, पात्र का मतलब यह होता है कि किसको दान दिया जा रहा है वह कौन है उसकी क्या आवश्यकताएं I कोई भिखारी है कोई पशु पक्षी है या ब्राह्मण है तो उसी के अनुसार उसको दान दिया जाना चाहिए

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌॥

राजस दान में सात्विक दान के विपरीत होता है इसमें दान देने वाला उपकार की दृष्टि से दान देता है और उस दान के बदले में कुछ पाना चाहता है और ऐसा दान जिसे देने वाले को कष्ट भी होता है दुर्गा पूजा के समय में, ट्रकों/बसों/रिक्शा वालों को रोकें, उन से जोर जबरदस्ती करके पर्चे कटवाते हैं तो वह दान देने वाले दान देने के इच्छुक तो नहीं होते प्रथम दृष्टया पर वह दान देते हैं क्योंकि वह समझते हैं कि दुर्गा मां को जायेगा लेकिन उसको देने में उनको कष्ट होता है क्योंकि वह अपनी कमाई के अनुसार जो दान देना चाहते हैं वह नहीं दे पाते हैं I ऐसा दान जो स्वार्थ पूर्ति के लिए दिया जाए जिसे देने वाला किसी उद्देश्य के कारण दान करें वह दान राजस है जैसे कि मैं परीक्षा में पास हो जाऊं मेरी अच्छी नौकरी लग जाए मुझे अच्छी लुगाई मिल जाए मेरी लॉटरी लग जाए मेरा यह काम बन जाए मेरा वह काम बन जाए मैं विदेश चला जाऊं इत्यादि

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

तामसिक दान तो वह बहुत ही घनघोर होता है घृणित होता है इसमें उपरोक्त बातों के विपरीत में सारे अवगुण होते हैं जैसे यह किसी ने देश और काल को और पात्र को देखकर नहीं दिया जाता और इस दान में कोई ना तो सत्यता होती है और ना ही इसमें कोई आज्ञा होती है तो ऐसे दान को तामसी दान कहा जाता है जिसमें धर्म को ध्यान में न रखते हुए दान देकर केवल और केवल दूसरे की बुराई के लिए जो दान दिया जाता है वह इस में आता है

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥ 16/01 गीता

16 अध्याय के पहले श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने देवी गुणों की चर्चा करिए तो उस देवी गुणों की चर्चा में एक शब्द उन्होंने बोला है दानम अर्थात दान करना एक दैविक गुण है

#कबीर_जी के दोहे

दान दिए धन ना घटे, नदी ने घटे नीर ।अपनी आँख देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥

कबीर जी कह रहे हैं कि दान देने से कुछ भी नहीं घटता है यह ऐसे ही होता है जैसे नदी से निकाला गया पानी तो सभी को दान अवश्य करना चाहिए

तिन समान कोई और नहि, जो देते सुख दान I सबसे करते प्रेम सदा, औरन देते मान।

उस मनुष्य के समान कोई नहीं है जो दूसरों को सुख का दान करते हैं। जो सबसे सर्वदा प्रेम करते हैं और दूसरों को सम्मान देते हैं। दुसरो को किसी भी प्रकार से सुख का दान देना भी दान है कबीर जी ने दान की परिभाषा को विस्तृत कर दिया है

जो जल बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम । दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानों काम ।।

कबीर जी कह रहे हैं जैसे नाव चला रहे हो और उसमें कई छेद हो जाए और नाव के अन्दर पानी बढ़ने लगे तो फिर उसी प्रकार से घर में जब धन-संपत्ति यश की वृद्धि होने लगे तो अपने दोनों हाथों का उपयोग करिए और जल्दी से नाव में से जल को निकालना शुरू कर दीजिए और घर में से जो आपके धन आया है उसको दान देना शुरू कर दीजिए तो शांति भी आनी शुरू हो जाएगी यही सयानो का कार्य है

#रहीम_जी

देनहार कोई और है भेजत सो दिन रात I लोग भरम हम पै धरै याते नीचे नैन ।

रहीम जी कहते है की दान तो मैं भी करता हूँ परन्तु जो दान देता हूँ उसका विधान तो पहले ही ईश्वर कर देता है और लोग समझते हैं की मैं दान दे रहा हूँ ये ईश्वर की कृपा है इसी लिए मेरे नेत्र नीचे को झुक जाते है (रहीम जी की ये विशेषता थी की वो जब दान देते थे आखे नीचे झुका लेते थे)

#धर्म

दान के बारे में धर्म शास्त्रों में यह भी उल्लेख किया गया है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी कमाई का कम से कम दसवां हिस्सा दान में जरूरी देना चाहिए यदि वह अपने महीने के वेतन में ₹ 100 लेकर आता तो कम से कम ₹10 का दान से करना चाहिए I दान देने का मतलब यह नहीं होता कि आप दान धन ही दें दान के लिए किसी विशेष परस्थिति की आवश्यकता नहीं होती है

💥दान देने के कई प्रकार हो सकते हैं जैसे कि

➖अच्छी अच्छी पुस्तकों का दान विधार्थियों को देकर दान कर सकते हैं

➖पक्षियों /चिड़िया/कबूतर इत्यादि को अनाज देकर दान दिया जा सकता है

➖आप अपनी छत पर बाजरा और पानी की व्यवस्था बनाकर भी दान कर सकते हैं,

➖जब आप खाने का कोई सामान कहीं पर रखें खुले में या पशुओं को खाने के लिए तो उस बगैर एक बात और ध्यान में रखें की जो जानवर है उसको पॉलिथीन खोली नहीं आती है और वह अनजाने में खाने वाली वस्तु के साथ उस पॉलिथीन को भी खा सकता है तो क्यों ना आप कुछ ऐसी व्यवस्था बनाएं जिससे कि वह जो खाने वाला पदार्थ है वह तो उसके अंदर चला जाए अथवा उसे खा सकें परंतु पॉलिथीन ना खाए I यह भी दान का एक सुंदर प्रकार है

➖स्वस्थ विचारों का दान देना और गंदे सन्देश को न देना अथवा उनकों रोक लेना

➖रक्त दान – जरुरत मंदों के लिए रक्त को दान दिया जा सकता है

➖काया दान – मृत्यु के बाद, medical विधार्थियों के लिए देह का दान भी दिया जा सकता है

➖नेत्र दान – मृत्यु के बाद,आप अपने नेत्रों को जब इस दुनिया से जाये तो उनकों दान दे सकते है

➖अंगो का दान – मृत्यु के बाद, आप अपने शरीर के अंगो का दान भी दे सकते है

इत्यादी विभिन्न प्रकार के दान देना और बदले में कुछ भी आस न करना ही दान देना है

💥जरा सोचिए💥

तो अब #यह_सोचिए की आपने पिछले 1 महीने या साल भर के दौरान आप ने कितना दान किया है कितने बार जरुरत मंदों को को ₹1 ₹2 ₹3 या ₹4 या ₹5 या ₹4 या ₹7 या ₹10 सो रूपया हजार रुपया कितने का दान किया है महीने में कितनी बार पक्षियों के लिए पानी डाला है और पशुओं के लिए पानी दिया है आपने 1 महीने में कितनी बार गरीबों को भोजन दिया है कपड़े का दान दिया है आपने कितनी बार विद्यार्थियों के लिए मुफ्त में पढ़ने लिखने का सामान दिया है आपने कितनी बार लोगों को धार्मिक स्थान के लिए प्रोत्साहित किया है क्या आपने कुछ इनमें से किया है नहीं किया है तो क्यों नहीं किया है क्या आपको नहीं करना चाहिए ।

बस इसी प्रश्न के साथ यह लेख समाप्त करते हैं।

बस इसी प्रश्न के साथ यह लेख समाप्त करते हैं। जय श्री काल भैरव
काल भैरव ध्यान संस्थान (सद्गुरु देव श्री तारामणि भाई जी)
(ज्योतिषीय परामर्शक,ध्यान मार्गदर्शक,पारलौकिक रहस्यविद,मृतात्मा सम्पर्ककर्ता) [इष्ट सिध्दि साधना,त्राटक साधना,यक्षिणी साधनाओ में सफलता हेतु संपर्क करे,पितृ दोष निवारण]
Dr. Taramani Bhai
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